गरीब सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण पर SC की मुहर, केंद्र सरकार की बड़ी जीत

Sumit Singh
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 संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से संवैधानिक और वैध करार दिया. जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने दिया बहुमत का फैसला. CJI यूयू ललित और जस्टिस एस रवींद्र ने असहमति जताते हुए इसे अंसवैधानिक करार दिया.


सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को अपने एक अहम फैसले में गरीब सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को लेकर अपनी मंजूरी दे दी. देश की सबसे बड़ी अदालत में 5 जजों की बेंच में से 3 जजों ने इसके पक्ष में अपना फैसला सुनाया. बेंच में शामिल जज दिनेश माहेश्वरी, बेला त्रिवेदी और जेबी पारदीवाला ने EWS संशोधन को बरकरार रखा है. जबकि चीफ जस्टिस उदय यू ललित और न्यायाधीश रवींद्र भट ने इस पर असहमति जताई है. EWS संशोधन को बरकराकर रखने के पक्ष में फैसला 3:2 के अनुपात में हुआ है. जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि जनरल कैटेगरी में ईडब्ल्यूएस कोटा वैध और संवैधानिक है तो जस्टिस भट्ट ने इसे अंसवैधानिक करार दिया.


जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने अपने फैसले में EWS आरक्षण को संवैधानिक करार दिया. उन्होंने कहा कि ये संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करता. ईडब्ल्यूएस पर आरक्षण भारत के संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है. आरक्षण संबंधी 103वें संविधान संशोधन को जस्टिस ने बरकरार रखा. सुनवाई के दौरान जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने कहा कि उनका फैसला जस्टिस माहेश्वरी के साथ सहमति में है. जनरल कैटेगरी में ईडब्ल्यूएस कोटा वैध और संवैधानिक है.


पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगेः याचिकाकर्ता

कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वो इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे. वकील वरुण ठाकुर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से ईडब्ल्यूएस कोटा आरक्षण मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाएगी क्योंकि 2 जजों का फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में है.


‘EWS संशोधन’ संविधान का उल्लंघन नहीं

वहीं, जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि ईडब्ल्यूएस संशोधन समानता संहिता का उल्लंघन नहीं करता है. ये संविधान की जरूरी विशेषताओं का उल्लंघन भी नहीं करता है. इसके अलावा 50 प्रतिशत के प्रावधान का भी उल्लंघन नहीं करता है. भारत के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित कहते हैं कि उच्च शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के आरक्षण की संवैधानिक वैधता और वित्तीय स्थितियों के आधार पर सार्वजनिक रोजगार के मुद्दों पर चार फैसले दिए जाने हैं. न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला भी संविधान के 103वें संशोधन अधिनियम की वैधता को बरकरार रखते हैं, जो जनरल कैटेगरी को 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करता है. सीजीआई यूयू ललित के साथ जस्टिस माहेश्वरी ने भी EWS आरक्षण को संवैधानिक करार दिया. उन्होंने कहा कि ये संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करता.


EWS आरक्षण को दी गई थी चुनौती

‘जनहित अभियान’ द्वारा 2019 में दायर की गई प्रमुख याचिका सहित लगभग सभी याचिकाओं में संविधान संशोधन (103वां) अधिनियम 2019 की वैधता को चुनौती दी गई थी. केंद्र ने 103वें संविधान संशोधन अधिनियम 2019 के माध्यम से दाखिले और सरकारी नौकरी में EWS के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है. शीर्ष अदालत ने पिछली सुनवाई में इस कानूनी सवाल पर 27 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था कि क्या ईडब्ल्यूएस आरक्षण ने संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन किया है.


शिक्षाविद मोहन गोपाल ने इस मामले में 13 सितंबर को पीठ के समक्ष दलीलें रखी थीं और ईडब्ल्यूएस कोटा संशोधन का विरोध करते हुए इसे पिछले दरवाजे से आरक्षण की अवधारणा को नष्ट करने का प्रयास बताया था. इस पीठ में चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला शामिल थे.



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